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’सूर्य पुत्री पुन्य सलिला मां ताप्ती अंचल शुद्धि अभियान’

date  21-06-2012      

सूर्य साधना वर्ष के अंतर्गत  सूर्य पुत्री ताप्ती को बचाने का गायत्री परिवार का महाअभियान 
"पुन्य सलिला मां ताप्ती अंचल शुद्धि अभियान"

मां ताप्ती का महात्म-: 
गंगाजी में नहा कर आवे, जमुनाजी के पान करावे, दर्षन करने नर्मदा जावे, उतना पुण्य तापी स्मरण में पावे। 

स्कंधपुराण के अनुसार जब ब्रम्हदेव ने सृष्टि रचना प्रारंभ की तब सम्पुर्ण जगत अंधकारमय था। अंधकार को दूर करने के लिए ब्रम्हदेव ने सूर्य नारायण रूपी मानस पुत्र को उत्पन्न किया। जिससे सम्पूर्ण जगत प्रकाशमय हुआ एवं पृथ्वी पर ताप बढने लगा जिसके कारण सुर्यनारायण के भूमण्य से कुछ पसीने की बूंदे गिरी और तापी का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। सुर्य के धर्म से उत्पन्न होने के कारण इनका नाम तापी, सूर्यपुत्री पडा।इसकी आयु 21 कल्प बताई जाती है इस मान से यह सृष्टि की प्रथम नदी है।
मां ताप्ती का जल हरे रंग का है यह जल स्वच्छ एवं शुद्ध है इसका सेवन करने से कोढ रोग व क्षय रोग से मुक्ति मिलती है। इसके जल का यह प्रभाव है कि इसमें अस्थियां एवं बाल गल जाते है यह प्रभाव किसी भी अन्य नदी के जल में नही इसका सेवन,स्नान,इत्यादी से मनुष्य निष्ताप एवं निरागी होता है।

ताप्ती का भौगोलिक स्थिति-:  पुण्य सलिला पावनी मां ताप्ती खानदेश की जीवन रेखा है भारत के केन्द्र मुलतापी (मूलताई) से इसका उदगम होता है। 724 किलोमीटर का सफर तय कर सागर में मिलने के पुर्व यह मध्य प्रदेष के बैतुल,बुरहानपुर महाराष्ट्र के जलगांव, अमरावती, बुलढाना,धुले,नंदुरबार होते हुए गुजरात के सूरत जिले में बहती है। यह नर्मदा के बाद दुसरी बडी नदी है जिसका प्रवाह पुर्व से पश्चिम की ओर है।

माँ ताप्ती की कथा व्यथा :-
प्रिय बेटे;

मैंने करोडों वर्षों से अपने आंचल की छाँव में मनुष्य को पाला पोषा है। आदिमानव से लेकर आज तक के विकास क्रम की साक्षी तुम्हारी यह मां तुम्हे व्यथा कथा सुनाना चाहती है। बेटे मैंने अनेक प्रलयकाल झेल कर तुम्हारे पूर्वजों को सदैव अपने आंचल में छुपाया तथा उन्हें नष्ट होने से बचाकर तुम्हारी पीढी को आगे बढाया है। भयंकर दुर्भिक्षों के समय में भी मैंने अपने आंचल में कभी अकाल को फटकने तक नही दिया।
परन्तु बेटे करोडों लागों की जीवन दायिनी तुम्हारी यह मां आज संकट में है तुम्हारे कुछ भाईयो ने मेरे किनारों के वनों की अंधाधुंध कटाई कर मुझे निर्वसन करना शुरू कर दिया है। यह इन हरे भरे वनों का ही आवरण तो था जो मुझे सदानीरा बनाए हुए था परन्तु कुछ स्वार्थी लोग इनही वनो को काट कर मेरा गला घोटना चाहते है। तुम्हारे गांवो और शहरों के असंतुजित विकास ने शहरो का मोटापा बढा दिया है जिससे शहरो की अंतहीन गंदगी,गंदे नले के रूप में मुझमें उडेली जा रही है। बेटे औद्योगिक विकास व शहरीकरण की आवश्यकता से मै इनकार नही करती लेकिन प्रदुषित औधोगिक अपष्टि तथा शहरी गंदगी को बिना किसी ट्रीटमेंट के मेरे अंदर डालकर मेरे अमृत तुल्य जल को जहरीला बना देना कहाँ की बुद्धिमानी है। अपने कछारों में लहलहाते खेतों को देखना तो मेरा सौभाग्य है परन्तु जब इन खेतो अंधाधुध तरीके से डाले गये उर्वरक व कीटनाशक वर्षा जल के साथ बहकर मेंरे अंदर आते है तो मै सिहर उठती हूँ । मेरे श्रद्धालु भक्त एक ओर तो मां कहकर मेरी पुजा करते हैं वही दुसरी ओर फुल, बेलपत्र, हवन की राख, नारियल की जटा, साबुन, शेम्पू, तेल, अस्थि विर्सजन की राख, मुंडन के बाल, आदि मेरे अंदर डालकर मुझे प्रदूषित करने में कोई कोर कसर बांकी नहीं रखते है। गणेष व दुर्गो की बडी-बडी प्रतिमाएं एव उनमें लगे केमिकल रंग मुझे घातक स्तर तक प्रदुषित करते हैं तो मैं चितकार कर उठती हूँ  बेटे इतनी बर्बरता व अत्याचार झेलकर तुम्हरी मां अपने जीवन के लिए संधर्ष कर रही हैं क्या तुम उसको बचाने के लिए कुछ करना चाहोगे? 
अपने पुरूषार्थ, पद, धन  व प्रतिभा का उपयोग यदि अपने स्तर पर करके मां की सेवा कर सको तो अति उत्तम है। अन्यथा गायत्री परिवार द्वारा भागीरथी जलाभिषेक अभियान अंतर्गत ताप्ती अंचल शुद्धि अभियान से जुडकर मातृऋण से मुक्त होने का संकल्प अवश्य करोगे ऐसा मेरा विश्वास  है। 
अपनी व्यथा कथा करूण कुंदन के रूप में तुम तक प्रेषित कर रही हूँ आशा है अपनी मां को निराश नही करोगे। 
तुम्हारी व्यथित हृदय मां
सूर्य पुत्री ताप्ती

ताप्ती अंच शुद्धि अभियान 

तीन लक्ष्य तीन परिणाम
ताप्ती जल शुद्धि   - निर्मल जल
ताप्ती तट शुद्धि    - स्वच्छ हरे भरे तट
ताप्ती ग्राम शुद्धि  - तटीय वायो ग्राम (तीर्थ ग्राम)


अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा ताप्ती जयंती को मां ताप्ती को हरित चुनर ओढने का कार्य उदगम स्थल मुल्ताई से अंतिम छोर सूरत तक किया जा रहा है जिसमे तटीय क्षैत्र में वृक्षारोपण का कार्य किया जावेगा तकि मां के आंचल को हरा भरा किया जा सके तथा सूर्यपुत्री सदा नीरा रह सके 

आइये हम भी इस अभियान में जुड कर अपने प्रकृति के कर्ज से मुक्त हो। 
त्वदीय पाद पंकजक , नमामी देवी सूर्यजा।।